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अचानक जगजीवन बाबू ने क्यों छोड़ी कांग्रेस?, बदल दी सत्ता !

1975 से 1977 के बीच लगाए गए आपातकाल के दौरान नागरिक अधिकारों के हनन और जिस तरह से सरकार चलाई जा रही थी, उससे बाबूजी अंदर ही अंदर असहमत थे।

अचानक जगजीवन बाबू ने क्यों छोड़ी कांग्रेस?, बदल दी सत्ता !


बिहार न्यूज़ प्रिंट : बाबू जगजीवन राम (बाबूजी) का कांग्रेस छोड़ना भारतीय राजनीति की एक ऐतिहासिक घटना थी, जिसे 'जे-बम' (J-Bomb) के नाम से भी जाना जाता है। आज 5 अप्रैल बाबू जगजीवन राम की जयंती (समता दिवस) भी है। 1908 में आज ही के दिन बिहार के भोजपुर जिले में उनका जन्म हुआ था।

उन्होंने 2 फरवरी 1977 को कांग्रेस से अचानक इस्तीफा दिया था। इसके पीछे के मुख्य कारण निम्नलिखित बताये गए थे:-

1. आपातकाल (Emergency) का विरोध
1975 से 1977 के बीच लगाए गए आपातकाल के दौरान नागरिक अधिकारों के हनन और जिस तरह से सरकार चलाई जा रही थी, उससे बाबूजी अंदर ही अंदर असहमत थे। हालांकि उन्होंने कैबिनेट में रहते हुए इसका सार्वजनिक विरोध नहीं किया था, लेकिन जब 1977 में चुनावों की घोषणा हुई, तो उन्होंने लोकतंत्र की रक्षा के नाम पर पार्टी छोड़ने का फैसला किया।

2. नेतृत्व के साथ वैचारिक मतभेद
इंदिरा गांधी और विशेषकर संजय गांधी के बढ़ते हस्तक्षेप से बाबूजी खुश नहीं थे। पार्टी के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया एकतरफा हो गई थी, जिससे बाबूजी जैसे अनुभवी नेता खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे थे।

3. प्रधानमंत्री पद की महत्वाकांक्षा और जातिगत राजनीति
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि बाबूजी को लंबे समय तक कांग्रेस का 'नंबर 2' नेता माना गया, लेकिन उन्हें कभी प्रधानमंत्री बनने का अवसर नहीं दिया गया। उनके समर्थकों का मानना था कि उनकी वरिष्ठता और अनुभव के बावजूद उन्हें केवल एक 'दलित नेता' के दायरे में सीमित रखा गया।

4. 'कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी' (CFD) का गठन
इस्तीफा देने के तुरंत बाद उन्होंने अपनी नई पार्टी 'कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी' बनाई। उनके इस कदम ने इंदिरा गांधी की सरकार की नींव हिला दी और विपक्षी एकता (जनता पार्टी गठबंधन) को भारी मजबूती दी।

इस्तीफे का प्रभाव:

सत्ता परिवर्तन: बाबूजी के इस्तीफे ने दलित वोट बैंक को कांग्रेस से दूर कर दिया, जो 1977 के चुनावों में कांग्रेस की करारी हार का एक बड़ा कारण बना।

किंगमेकर की भूमिका: चुनाव के बाद वे प्रधानमंत्री पद के प्रबल दावेदार थे, लेकिन आपसी खींचतान के कारण उन्हें उप-प्रधानमंत्री के पद से संतोष करना पड़ा और मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने।

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